Wednesday, December 13, 2017

Windmill Children Festival 2017, Mumbai


Windmill Festival (16-17 December 2017), India's first ever International Children's festival is here! Tinkle and Amar Chitra Katha are going to be there with so many fun workshops! Visit bit.ly/2xyJnjL to book your tickets today!

Jio-Garden, BKC, C-WING, Bharat Nagar Road, G Block, Block BKC, Bandra Kurla Complex, Bandra East, Mumbai, Maharashtra 400051, India
Facebook: @windmillfestival
Instagram: @windmill_fest
Twitter: @windmillfest
#event #fest #kids #india

Monday, December 11, 2017

Nagraj Cosplay


Nagraj (Raj Comics) Cosplay - Rudra Rajpoot, Event - Nagraj Janmotsav, 07 December 2017. #comics #cosplay #indiancomics #nagraj #rajcomics

Tuesday, December 5, 2017

Cosplay scene in India


टेलीविजन, किताब, कॉमिक, एनिमेशन, वीडियो गेम जैसे माध्यमों के किसी चर्चित किरदार जैसा श्रृंगार और वेशभूषा अपनाने को कॉस्प्ले कहा जाता है। पिछले 4-5 वर्षों में भारतीय कॉस्प्ले कम्युनिटी काफी बड़ी हो गयी है। बड़े शहरों में कॉस्प्ले क्लब हैं, कुछ कॉसप्लेयर्स के प्रशंसकों की संख्या दस हज़ार पार कर चुकी है और तेज़ी से बढ़ती जा रही है। अब कॉमिक कॉन ही नहीं महानगरों में होने वाले कई आयोजनों में कॉस्प्ले कार्यक्रम, प्रतियोगिताएं शामिल की जाती हैं। कॉमिक कॉन में आने वाले कॉसप्लेयर्स की संख्या तो इतनी अधिक है कि फिल्म, कॉमिक्स, वीडियो गेम आदि श्रेणी के अनुसार अलग-अलग विजेता घोषित किये जाते हैं, वो भी कॉन के 3 दिनों में हर दिन अलग प्रतियोगिता। भारत में आयोजित कॉस्प्ले प्रतियोगिताओं को जीत कर समीर बुंदेला यू.एस.ए. और आकांक्षा सचान जापान में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। भारतीय कॉमिक किरदारों पर कॉस्प्ले की जो कुछ कोशिशें हुई वो तारीफ़ लायक थीं पर उनको निरंतर कॉसप्ले करने वाले प्रशंसकों ने नहीं किया था; इसलिए उन अच्छे प्रयासों में पूर्णता, गहन डिटेलिंग नहीं लगी। आगे हो सकता है विविधता खोजता कोई नामी कॉसप्लेयर किसी भारतीय सुपरहीरो का कॉसप्ले करे पर क्या उस से पहले इतनी बड़ी कम्युनिटी से एक प्रशंसक ऐसा कॉसप्ले नहीं कर सकता जिसे देख कर यह ना बोलना पड़े कि "चलो किसी ने इन किरदारों पर ट्राई तो किया, वैरी गुड!" बल्कि अपने-आप मुँह से निकले "अरी मईया री...देखो मुझे मौत आ गयी ये कॉस्प्ले देखकर!" है कोई इस चैलेंज को एक्सेप्ट करने वाला/वाली? :)
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Pic - Cosplayer IMJM

Sunday, October 29, 2017

Categories: Indian Comics Fandom Awards 2017 #ICFA_2017


Indian Comics Fandom Awards 2017 Categories

*) – Best Blogger-Reviewer
*) – Best Cartoonist 
*) – Best Colorist 
*) – Best Comics Collector
*) – Best Fanfiction Writer 
*) – Best Fan Artist
*) - Best Fan Work (Comic, Video, Music etc)
*) - Best Webcomic
*) - ICF Hall of Fame

ICF Awards 2017 results to be calculated based on previous awards polls, nominations. Cosplay category discontinued after no recorded cosplay on any character from Indian Comics universe 2 years in a row. No category-wise separate polls this year. However, you can still nominate a fan or artist in these categories. Your nomination mail/message equals to one vote. Email nominee's name, category (maximum 3 category nominations for 1 person) - letsmohit@gmail.com or inbox us (Indian Comics Fandom), Deadline is Tuesday, 31 October 2017
Image Credit - Vector Open
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#freelance_talents #icfawards #indiancomics #indiancomicsfandom #ICFA_2017 #freelancetalents #comics #art

Tuesday, October 24, 2017

7th Heaven Series (Inderjit Comics)

Bombay Boulevard (Issue 1)

Issue 2


Credits

Head of Inderjit Comics - Eric Raisinghani and Abhay Raj Kanwar (2013)

Monday, September 18, 2017

Camlin Supercops (Tinkle)


Camlin Supercops Adventure (Tinkle Magazine)


This month's episode will see the Camlin Supercops give the test of their lives! Say hello to THE EXAMINATOR! This tyrannical half-robot, half-man, full-villain is out to end the Camlin Supercops once and for all, with a tirade of tiresome questions! Oh, and LASERS! Read the latest episode of @Kokuyo Camlin Supercops

Comics Memories (Deepak)

Courtesy - Mr. Deepak Jangra, Group - Comics Fans Society

मित्रों जब मैं छोटा था तब मेरे पिताजी हर रविवार को दैनिक ट्रिब्यून अखबार लेकर आते थे। उस अखबार में एक 4 रविवारीय पृष्ठ होते थे। उन्ही में से एक पृष्ठ पर डायमण्ड कॉमिक्स के पात्र रमन की एक कहानी होती थी। कॉमिक्स से सर्वप्रथम परिचय मेरा इसी माध्यम से हुआ। हमारे परिवार में मेरे चाचा जी भी कॉमिक्स पढ़ते थे जो की आज भी मुझसे लेकर पढ़ते हैं। उन्ही की लाई हुई 2 कॉमिक्स घर पर पड़ी रहती थी जिनके नाम मुझे अबतक याद हैं दोनों मनोज कॉमिक्स थी। एक थी हवलदार बहादुर और चिन चिन पोटली और दूसरी थी अजगर का संसार।

मुझे आज भी याद है की जब अजगर का संसार कॉमिक्स के कवर पृष्ठ के अंदर की ओर टोटान की आगामी कॉमिक्स का कवर छपा होता था जिसमे टोटान को तो बांध रखा होता है और उसके सामने एक मकड़ी जैसा प्राणी होता है, ईसके अलावा और भी भुतहा चित्र होते हैं, उन चित्रों को जब भी मैं देखता था तब मुझे एक अलग ही दुनिया का, एक अलग ही संसार का अहसास होता था। यकीनन वो कॉमिक्स का ही संसार था, कॉमिक्स की ही दुनिया थी वो। उपरोक्त दोनों कॉमिक्स में से मैने हवलदार बहादुर और चिन चिन पोटली पढ़ी थी। उस कॉमिक्स की कहानी के मुख्य बिंदु आज भी मुझे याद हैं। बेदी जी द्वारा किया गया चित्रांकन, उटपटांग चेहरे और उन पर की गई अलग अलग रंगों से कलरिंग ने इस कदर दिलोदिमाग पर अपनी छाप छोड़ी थी की आज तक मैं उन्हें भूल नही पाया हूँ। मेरे कॉमिक्स प्रेम के प्रति मेरे घरवालों का जो नजरिया था वो बाकि कॉमिक्स प्रेमियों से अलग नही था। यानि की नजरिया नकारात्मक था। घरवालों की नजर में कॉमिक्स एक समय को बर्बाद करने वाली और पढ़ाई से दूर ले जाने वाली चीज थी। घरवालों के इसी नजरिये के कारण ही कई बार कॉमिक्स छुप कर पढ़नी पड़ती थी और छुपाकर रखनी पड़ती थी। कई बार घरवालों मेरी कई कॉमिक्स जब्त भी की जो की फिर कभी भी मुझे प्राप्त नही हुई। अब घरवालों का नजरिया पहले जैसा नही है यही कारण है मेरा कॉमिक्स कलेक्शन घर पर सुरक्षित है।

कॉमिक्स कलेक्शन की अगर बात की जाए तो बचपन में सिर्फ कॉमिक्स पढ़ने पर ही जोर दिया था मैने, क्योंकि उस समय उतने पैसे नही होते थे की अपना कलेक्शन किया जाए। फिर बीच में मैं कॉमिक्स से थोड़ा दूर हो गया था। 2014 में मैने कलेक्शन फिर से शुरू किया। मेरी पसन्दीदा कॉमिक्स कम्पनी की अगर बात की जाए तो मुझे अब तक प्रकाशित कॉमिक्स के आधार पर मनोज और राज ही सबसे अच्छी लगती हैं। राज कॉमिक्स को मैं पसन्द करता हूँ सुपरहीरोज, थ्रिल हॉरर सस्पेंस, जनरल कॉमिक्स के कारण और मनोज कॉमिक्स को उनकी नॉन हीरोज कहानियों और हवलदार बहादुर, क्रुकबांड आदि कॉमेडी करेक्टर्स के कारण। मेरे कॉमिक्स कलेक्शन में मुझे कॉमिक्स की संख्या तो पता नही है क्योंकि गिने हुये काफी दिन हो गए हैं फिर भी इतना मैं कह सकता हूँ की मेरे कलेक्शन में 1200 से ज़्यादा कॉमिक्स हैं। आज कॉमिक्स संस्कृति की जो हालत है वो उतनी अच्छी तो नही है जितनी पहले होती थी। पाठक बहुत कम हो गए हैं। बिक्री भी उसी अनुपात में घटी है। मनोज, तुलसी आदि कम्पनियाँ बन्द हो चुकी हैं। पाइरेसी ने भी कॉमिक्स इंडस्ट्री का काफी नुकसान किया है। कॉमिक्स संस्कृति के इस हाल के लिये कॉमिक्स कम्पनियों के मालिक लोग भी उत्तरदायी हैं जो वो समय के साथ नही चले। अगर समय के साथ वो कॉमिक्स को कागज के पन्नों से निकाल कर छोटे और बड़े पर्दे पर लेकर जाते तो कॉमिक्स संस्कृति की ये हालत नही होती। वैसे अभी भी देर नही हुई है। हमें आभारी होना चाहिये मित्रों राज कॉमिक्स का जो वो आज भी पाठकों की कम संख्या होने के बाद भी कॉमिक्स का प्रकाशन कर रहे हैं। और अब तो उन्होंने app बनाकर टेकनोलॉजी के साथ भी कदम मिलाकर चलना शुरू कर दिया है। जल्द ही YouTube पर हमें आदमखोर हत्यारा कॉमिक्स पर आधारित फ़िल्म आदमखोर भी देखने को मिलने वाली है। आशा करता हूँ की राज कॉमिक्स अपने इन प्रयासों से भारत में कॉमिक्स संस्कृति वही समृद्धि और वही लोकप्रियता दिलाने में सफल हो जाएगी जो कभी पहले होती थी, शायद समृद्धि और लोकप्रियता पहले से भी ज़्यादा हो जाए। हमे भी राज कॉमिक्स का सहयोग करना चाहिये। कॉमिक्स संस्कृति को समृद्ध बनाने के लिये हमे पाइरेसी का विरोध करना चाहिये और कॉमिक्स हमेशा खुद भी खरीद कर पढ़नी चाहिये और दूसरों को भी खरीद कर पढ़ने के लिये प्रेरित करना चाहिये।

Sunday, September 17, 2017

Memories (Mr. Vikas Das)


मैँ अगर पिछे मुड कर देखता हूँ तो अाज के दौर के मुकाबले में ९० का दशक मेरे जीवन का गोल्डन टाईम था, ऐक शानदार दौर जो मेरे समकालिन मित्रो ने भी जीया होगा....नब्बै के दशक मे चार चीजे आम तौर से प्रसिद्ध थी पतंग बाजी कबूतर बाजी,क्रिकेट के प्रति दिवानगी (मार्टिन क्रो, मार्क ग्रैटबैच,इमरान खान,कपील देव,रिचर्ड हैडली,इयान बाथम, डेसमंड़ हैंस आदि नाम छाया रहता था) छज्जे की आशिकी (बडे भाईयो को देखता था मोबाईल न होने के कारण हम लव लैटर सप्लायर का काम करते थे) और कॉमिक्स का क्रैज ( चाचा चौधरी राम रहिम,फौलादी सिंह काला प्रेत,शेरा,शाका पुरे रंग मे थे)....बस यही दौर था जब मेरा कॉमिक्स की दुनिया मे प्रवेश हुआ....

मुझे आज भी याद है वह दिन जब गर्मियो की छुट्टिया चल रही थी और मै अपनी बुआ के यहा "आसाम" मे था २ साल वहाँ रहने के बाद (१९८८मे वहाँ चला गया था मात्र ६ साल की आयु मे) ऐसी जीद पकडी खाना पीना छोड दिया की घर जाना है थक हार कर दादा (बंगालियो मे बडे भाई को दादा बोलते है) मुझे रुड़की ले आऐ 
रुड़की आने के करीब हफ्ता भर ही बीता होगा की ऐक रात मेरा सबसे बडा भाई प्रणब कॉमिक्स लाया जो उसने रात को पढ़ी, सुबह करीब ५ बजे कॉमिक्स पर मेरी पडी तो उतसुक्ता वश मैने पढ़नी चाही लेकिन आसाम मे रहने के कारण अंग्रैजी और बंगाली,असमिया मे पारंगत हो चुका था हिन्दी पढने मे कठिनाई होने लगी थी तो मेरे से बडे भाई पंकज ने स्टोरी पढ़नी शुरु की और मै सुनने लगा भाई क्या बवाल स्टोरी और हंस हंस कर लोट पोट करने वाली कहानी थी वह कॉमिक्स ही मेरे जीवन की प्रथम कॉमिक्स थी जो मैने पढ़ी तो नही लेकिन इसे पढ़ी हुई ही मानता हुँ! और वह कॉमिक्स थी "बांकेलाल और मुर्दा शैतान" बस इस कॉमिक्स के बाद तो मुझे कॉमिक्स पढ़ने का ऐसा चस्का लगा की छुटे नही छुटता था....नागराज की पहली कॉमिक्स जो मेरे हाथो मे आयी थी वह थी "नागराज की कब्र" नागराज की इस कॉमिक्स के बाद नागराज को और जानने की इच्छा हुई तो मैने वाकई में नागराज की कब्र ही खोद दी फिर तो नागराज का लगभग सारा कलैक्श इक्कठा कर लिया था वह दौर सिर्फ राज कॉमिक्स का ही नही था वह समय कॉमिक्स का गोल्डन टाईम था लगभग हर प्रकार की ऐडिशन की कॉमिक्स मैने पढी डायमंड,तुलसी,मनोज,दुर्गा,फोर्ट,गोयल,चुन्नू,राधा, किंग,नूतन ,पवन आदि आदि लगभग सभी कॉमिक्स पढी मेरे पसंदिदा कॉमिक्स करैक्टरो की लिस्ट हमेशा ही लंबी रही है क्योकी मैने हर तरह की कॉमिक्स पढी ! लेकिन मै हमेशा नागराज का दिवान रहा आंठवीं तक नागराज की तरह बालो स्टाईल बना स्कुल जाया करता था कई बार सुभाष सर और नरेन्द्र सर के रैपटे खाऐ पर क्या मजाल तो बाल का स्टाईल भी बिगडने दिया हो....स्कुल की किताबो के बीच में कॉमिक्स छिपाने का तरिका तो सिर्फ मुझे ही मालुम था जो अच्छो अच्छो के पकड़ मे नही आता था....

ऐक दौर मे राज कॉमिक्स ने कई प्रतियोगिता भी जारी की जिसमे मैने और मेरे भाई ने कई ईनाम की कब्जाऐ...
जिसमे से ऐक प्रतियोगिता मे मे राज कॉमिक्स ने "डोगा" की कॉमिक्स का कोई कॉमिक्स टाईटल का नाम लिख कर भेजने को कहाँ था....जिसमे से मैने दो टाईटल भेजे थे जिन पर राज कॉमिक्स वालो ने डोगा की कॉमिक्स भी छापी और वह दो कॉमिक्स थी "आखिरी गोली" और " झबरा" लेकिन तब छोटा होने के कारण चिट्ठी कैसे लिखते पोस्ट कैसे करते है का पता नही था तो मेरे भाई पंकज ने अपने नाम से पोस्ट कर दिया तो कॉमिक्स के लास्ट के पन्ने पर पंकज दास का नाम छपा और मैं मन मसोस कर रह गया हाँ ईनाम में ऐक पर्स और फाईटर टोड्स का ऐक मनी बैग मिला था जो सदैव मेरे कब्जे मे रहा अभी कुछ माह पुर्व माँ का देहांत होने पर जब माँ का बक्सा खोला तो फाईटर टोड्स का मनी बैग मिला तो वह पुरा काल मेरी आँखो के आगे घुम गया.......लेकिन अब वह रस नही रहा कॉमिक्स जगत अपनी अंतिम साँसे गिन रहा है यह सोच कर ही बदन पर सिरहन दौड जाती है....कभी रुड़की की किसी भी गली मे निकल जाते थे तो परचुन की दुकान में भी कॉमिक्स टंगी दिखाई दे जाती थी अब न कॉमिक्स है न पढ़ने वाले बच्चे.....अब जो थोड़ी बहुत कॉमिक्स छपती है उस के अंतिम पीड़ी ही हम है. लिखने को बहुत कुछ है लेकिन अब थक गया हुँ....
शायद मेरे समकालिन मित्रो की यही कहानी होगी

Thursday, August 31, 2017

Disaster Management Educational Comics


"Gudiya Munna", Disaster Management educational comic series by #artist Neerad (Bihar Govt.) #comics #kids #education

Monday, July 3, 2017

Raj Comics has acquired rights to Nutan Comics characters


Raj Comics acquires all-character rights of #vintage Nutan Comics (Nutan Chitrakatha). Nutan Comics characters like Meghdoot, Chutki, Bhootnath, Raka, Jonga etc are set to make their debut in upcoming issues of Sarvanayak Series. Nutan Comics are also available on Raj Comics mobile app.


(L-R) - Rajiv Jain, Manish Gupta (Raj Comics), Sumat Prasad Jain and Sanjeev Jain

Sunday, July 2, 2017

TBS Planet Completes 1 Year


Rajeev Tamhankar (Founder, TBS Planet Comics) - "This has been a very special moment for us! TBS Planet Comics just turned 1. And we celebrated the occasion with our employees, their parents and the Mayor of Jabalpur. The event was followed by cake-cutting, dinner and our Quarterly and Annual employee awards."



Superhero of the Quarter Award (January-March) 2017 - Pawan Kulkarni
Superhero of the Quarter Award (April-June) 2017 - Salil Kolhe
Superhero of the Year 2016-17 Award - Pallavi Kulkarni

Thursday, April 13, 2017

Interview with Superfan Supratim Saha

नागपुर में रह रहे सुप्रतिम साहा का नाम भारतीय कॉमिक्स प्रेमियों के लिए नया नहीं है। सुप्रतिम भारत के बड़े कॉमिक्स कलेक्टर्स में से एक हैं, जो अपने शौक के लिए जगह-जगह घूम चुके हैं। कहना अतिश्योक्ति नहीं, ऐसे सूपरफैंस की वजह से ही भारतीय कॉमिक्स उद्योग अभी तक चल रहा है। पहले कुछ कॉमिक कम्युनिटीज़ में इनका अभूतपूर्व योगदान रहा और समय के साथ ये अपने काम में व्यस्त हो गए। हालांकि, अब भी कुछ कॉमिक्स ग्रुप पर सुप्रतिम दिख जाते हैं। ये मृदुभाषी और सादा जीवन व्यतीत करने में विश्वास करते हैं, इनके बात करने और वाक्य गढ़ने का तरीका मुझे बहुत भाता है इसलिए साक्षात्कार के जवाब में मेल से भेजे इनके जवाबों को जस का तस रखा है। 

अपने बारे में कुछ बताएं?
सुप्रतिम - 80 के दशक में भारत के पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में मेरा जनम हुआ। मैने अपनी स्कूलिंग अगरतला शहर से की। मैने इंजिनियरिंग की नागपुर शहर से और बॅंगलुर शहर मे कुछ टाइम जॉब करने के बाद मैने मास्टर्स की चेन्नई शहर मे, आज मैं नागपुर के एक कॉलेज मे वाइस प्रिन्सिपल के पद पे काम कर रहा हू. आज भी मैं रेगुलार कॉमिकस खरीदता हू और पढ़ता हु्। मुझे मालूम हैं मेरा यह जुड़ाव कॉमिक्स के साथ हमेशा  रहेगा. इस सफ़र मे मैं अपने कुछ दोस्तो का नाम लेना चाहूँगा जिन्होने हमेशा मेरा साथ निभाया, बंटी फ्रॉम कोलकाता, संजय आकाश  दिल्ली से, गुरप्रीत पटियाला से, और बहत सारे दोस्त, वरुण ,मोहित, महफूज़ ,ज़हीर,विनय,अजय ढिल्लों  जिन्हे मैं ऑनलाइन मिला और इन सब से भी मेरी काफ़ी अच्छी दोस्ती हैं। सबके नाम शायद मैं यहा लिख नही पाया पर  मैं सबका आभारी हूँ जिन्होने इस सफ़र पे मेरा साथ निभाया। 

कॉमिक्स कलेक्शन का आपका सफर कैसे शुरू हुआ?
सुप्रतिम - मेरे कॉमिक्स पढ़ने की अगर बात करे तो ये शुरुवात हुई थी 1991-92 के आसपास। उन दिनों मैं क्वार्टर में रहता था और हर एक  घर से बटोर के जो कॉमिक्स मुझे मिलते थे उनमे से ज़्यादा तर या तो टिनटिन होते थे या फिर इंद्रजाल कॉमिक्स।  हिंदी कॉमिक इंडस्ट्री से मैं जुड़ा 1994 में जब मेरे एक राजस्थानी मित्र ने मुझे दो कॉमिक्स दी, वो दो कॉमिक्स थे डॉ नो और उड़ती मौत। राज कॉमिक्स और साथ ही अन्य हिंदी  कॉमिक्स के साथ मैं इन्ही दो कॉमिक्स की वजह से जुड़ा। 

अब तक कॉमिक्स के लिए कहाँ-कहाँ घूम चुके हैं?
सुप्रतिम - कॉमिक्स के लिए ट्रेवल करना मैंने शुरू किया सन 2009 से, यह वो समय था जब मैं बैंगलोर में था.बैंगलोर के अनिल बुक शॉप से बहत सारी कॉमिक्स मैंने रिकलेक्ट की.इसको छोड़के मैंने सबसे ज़्यादा कॉमिक्स कलेक्ट की नागपुर से। इस शहर ने मुझे ऑलमोस्ट 1500 + कॉमिक्स दी जिनमे मैक्सिमम दुर्लभ कॉमिक्स थे। इन 8 सालो में मैंने दिल्ली, नागपुर, कोलकाता, हैदराबाद, बैंगलोर, चेन्नई, पटियाला, अम्बाला, अगरतला जैसे शहरो से भी कॉमिक्स ली। दिल्ली शहर में दरीबा कलां के गोडाउन  से भी मैंने 1000+ कॉमिक्स ली।  इन दो शहर को छोड़के हैदराबाद शहर में भी मुझे 300+ विंटेज डायमंड कॉमिक्स मिलें। ऐसी कॉमिक्स जो की 35 साल से भी अधिक पुराने हैं,जैसे की लंबू मोटू ,फौलादी सिंह ,महाबली शाका ,मामा भांजा और वॉर सीरीज वाली कॉमिक्स। इन सब को छोड़के मेरे पास बंगाली कॉमिक्स भी है भारी संख्या में, करीबन 500 ,जिनमे पिछले 60-80 साल पुराने कॉमिक्स भी हैं। मैं आज भीं रेगुलर कॉमिक्स लेता हु हिंदी बंगाली इंग्लिश में। 

पहले के माहौल और अब में क्या अंतर दिखते हैं आपको?
सुप्रतिम - पहले के माहौल में कॉमिक्स एक कल्चर हुआ करता  था, आजकल कॉमिक्स तो दूर की बात हैं किताबों को पढ़ने के लिए भी पेरेंट्स बच्चो को प्रोत्साहित नहीं करते।  विडियो गेम्स केबल टीवी आदि तो मेरे बचपन में भी आराम से उपलब्ध थे ,पर इन सबके बावजूद अगर हर दिन खेलने नहीं गए, तैराकी नहीं की तो घर पे डांट पड़ती थी। आजकल कॉमिक्स,खासकर के कोई भी "रीजनल " फ्लेवर की कॉमिकस को पढ़ना लोगो के सामने खुदको हास्यास्पद करने जैसा हैं। यही वजह हैं की सिर्फ वही लोग देसी कामिक्से पढ़ते हैं जिनमे रियल पैशन हैं, वरना मंगा और वेस्टर्न कॉमिक्स को ही सीरियस कॉमिक्स समझने और ज़ाहिर करने वालो की भी कमी नहीं हैं। एक कॉमिक बुक फैन होने के नाते मुझे सभी कामिक्से देसी  या विदेसी  अच्छे  लगते  है पर भाषा के नाम पे यह भेदभाव आज बहत ज़्यादा प्रभावशाली हैं। 

अपने शहर के बारे में बताएं।
सुप्रतिम - मेरा जन्म भारत के पूर्वोत्तर मे स्थित अगरतला शहर मे हुआ। गौहाटी के बाद ये पूर्वोत्तर के सात राज्यो मे दूसरा प्रमुख शहर भी हैं। बॉर्डर से सटे होने की वजह से यहा बीएसएफ भी कार्यरत हैं जिनमे से काफ़ी लोग हिन्दी भाषी है। साथ ही साथ ओ एन जी सी होने के कारण से हिन्दी भाषी लोग काफ़ी मात्रा मे मौजूद भी है। ज़ाहिर सी बात हैं की इस वजह से हिन्दी कॉमिक्स शुरू से ही यहा रहते लोगो का मनोरंजन करती आ रही हैं. समय के साथ साथ हिन्दी कॉमिक्स का क्रेज़ यहा काफ़ी कम हो चुका हैं पर आज भी मैं घर जाता हू तो भूले भटके एक आधा दुकान मे कुछ दुर्लभ कॉमिकसे खोज ही निकलता हूँ। 

आप अक्सर स्केच बनाते हैं, स्केचिंग का शौक कब लगा?
सुप्रतिम - स्केचिंग का  शौक  मुझे कॉमिक्स से नही  लगा। उन दिनो (1993) जुरासिक पार्क फिल्म का क्रेज़  सबके सिर चढ़के बोल रहा था , मेरे घर पे एक किताब थी जिसका नाम था "अतीत साक्षी फ़ॉसिल" उस किताब मे डाइनॉसॉर के बारे मे जानकारियाँ थी और अनूठे चित्र थे, मैं दिन भर उन्ही के चित्र कॉपी करने के कोशिश मे लगा रहता था। कुछ एक बार जब मेरे इन प्रयासो को लोगो ने मुर्गी,बतक के चित्र के रूप मे शिनाख्त की तो मैं फिर कॉमिक स्टार्स के चित्र बनाने लगा। बचपन मे सबसे ज़्यादा चित्र मैने भेड़िया के बनाए (प्री-1997) ,नागराज के चित्र बनाते हुए मैं काई बार पढ़ाई के वक़्त पकड़ा भी गया। आज कल समय मिलता नही हैं पर उत्सुकता पहले जैसी ही हैं।

आपके हिसाब से एक अच्छी कॉमिक्स के क्या मापदण्ड हैं? 
 सुप्रतिम - एक अच्छी  कॉमिक्स का मापदंड किसी एक विषय पे निर्भर नहीं करता, पर पहला मापदंड यह हैं की उसके चित्र और कहानी में से कोई भी एक पहलु जोरदार होनि चाहिये। हालाकी चित्र अव्वल दर्जे का हो तो सबसे पहले ध्यान आकर्षित करता है। पर ऐसे कॉमिक भी होते हैं जिनमे चित्र का योगदान कम होता है और कहानी इतनी ज़बरदस्त होती है की दिल को छु जाती हैन.जैसे की "अधूरा प्रेम".वैसे ही काफ़ी ऐसे कॉमिक्स भी होते हैं जिनके साधारण से कहानी को
चित्रकला के वजह से एक अलग ही आकर्षण मिलता हैन. मनु जी के द्वारा बनाए गये सभी परमाणु के कॉमिक्स इस श्रेणी मे आते हैं. आज भी अगर कॉमिक्स के क्वालिटी की बात आए तो आकर्षक चित्रकला ही वो प्रमुख माध्यम हैं जिससे आप एक कॉमिक्स से प्रभावित होते हैं। 

अपनी पसंदीदा कॉमिक्स, लेखक, कलाकार और कॉमिक किरदारों के बारे में बताएं। 
सुप्रतिम - मेरी पसंदीदा कॉमिक्स, किरदार के हिसाब से देखा जायें तो  होंगे ग्रांड मास्टर रोबो, ख़ज़ाना सीरीज़, भूल गया डोगा, टक्कर, खरोंच, 48 घंटे सीरीज़, लाश कहा गयी, चमकमणी, महारावण सीरीज़, अग्नि मानव सीरीज़, प्रोफ शंकु सीरीज़ आदि। अनुपम सिन्हा जी ,सत्यजीत राय,संजय जी मेरे प्रिय लेखक मे से हैं। प्रताप जी,अनुपम जी, मनु जी, डिगवॉल जी, ललित शर्मा जी, चंदू जी, सुजोग ब्न्दोपध्यय जी, अभिषेक चटेर्ज़ी, मलसुनी जी, मयुख चौधरी जी,गौतम कर्मकार
जी मेरे प्रिय कलाकार हैं।  ध्रुव, नागराज, परमाणु, डोगा, भेड़िया, प्रोफेसर शंकु, कौशिक, फेलूदा, महाबली शाका,फॅनटम, घनादा मेरे फ़ेवरेट क़िरदार हैं। 

बचपन की कोई हास्यास्पद घटना, याद बांटिये। 
सुप्रतिम - बचपन मे मेरे एक राजस्थानी मित्र राकेश कुमार मीना ने मुझे पहली बार राज कॉमिक से अवगत कराया। उसीके साथ हुआ एक वाक़या मुझे याद हैं जिसे हास्यास्पद घटना कहा जा सकता हैं। राकेश और मेरे पास जितनी भी कॉमिकस थी, उनको हम एक्सचेंज करके पढ़ते थे। एक बार हुआ यह की मुझे उससे दो कॉमिक से लेनी थी, जिनमे से एक थी इंद्र की और दूसरी थी ताउजी कि, अब हुआ यह की यह दोनो कॉमिक आठ रुपये के थे। जब मैने उसे अपने दो कॉमिकसे दी तो उसने मुझे कहा की तेरे दो कॉमिक्सो का मूल्य पन्द्रह रुपये हैं तो मैं तुझे मेरे दो कॉमिक, जो की सोलह रुपये के हैं, तुझे नही दे सकता। उसके इस बिज़नेस माइंडनेस की जब भी कल्पना करता हू तो आज 22 साल बाद यह घटना हास्यास्पद ही लगता हैं। दूसरी घटना भी 1995 की ही हैं, मैं अपने फॅमिली के साथ जा रहा था बन्गलोर्, हम कलकत्ता  मे ठहरे हुए थे और मशहूर कॉलेज स्ट्रीट से होके गुज़र रहे थे की मुझे एक दुकान मे कॉमिकस दिखि। मेरे कहने पे पापा ने मुझे दो कॉमिकसे दिलवाई, एक थी “बौना शैतान” और दूसरी “ताजमहल की चोरिं “मुझे हैरत हुई जब दुकानदार ने पापा से 6 ही रुपये माँगे, और मुझे पहली बार मालूम पड़ा की सेकेंड हॅंड बुक्स किसे कहते है। बचपन के यह मासूम किससे सही मायने मे हास्यास्पद ना सही,होठों पे मुस्कान ज़रूर लाती हैं। 

बदलते समय के अनुसार कॉमिक्स प्रकाशकों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
सुप्रतिम - देसी कॉमिक्स के दौर को मैं कूछ किस्म मे बाँटना चाहूँगा. 1940-1970 के दशक मे बंगाल मे वीदेसी कॉमिक्स के अनुकरण मे काफ़ी विकसित कॉमिकस बनी, जिनमे सायबॉर्ग जैसे कॉन्सेप्ट्स काम मे लाए गये। 1970 से हिन्दी कॉमिक इंडस्ट्री मे भी सहज सरल चित्रो के साथ कॉमिकसे आई। 1980 से कॉमिकसे काफ़ी विकसित हो गई और 1990-2000 तक हिन्दी कॉमिक इंडस्ट्री का सुनेहरा दौर रहा। 2000 के बाद की बात करें तो डिजिटल फॉरमॅट्स के बदौलत हिन्दी कॉमिक इंडस्ट्री मे काफ़ी चेंजस आयें। आज भी कुछ कॉमिक्स मे जैसे की बंगाली कॉमिक्स इंडस्ट्री मे मैनुअल कलरिंग का प्रयोग बखूबी से किया जाता हैं। समय के साथ कुच्छ इंडस्ट्रीस बदल गये और कूछ ने अपना पुराना स्टाइल बरकरार रखा, पर एक अच्छी कॉमिक्स को आज भी फैंस जैसे  भाँप लेते है। बदलते समय में स्टाइल बदला होगा पर अच्छे कॉमिक्स का मापदंड वही हैं जो पहले से थे। प्रकशको से मेरी बीनति रहेगी की यह पॅशन ही हैं जो एक कॉमिक को आकर्षक बनाती हैं ना की नयी तकनीक. कॉमिक बनाते वक़्त उन मौलिकताओ का ध्यान रखे जिनकी वजह से कॉमिक्स ने हमारे बचपन को इतने रंगो मे रंगा। 

कॉमिक्स पाठकों के लिए आपका क्या सन्देश है?
सुप्रतिम - कॉमिक्स पाठक बंधुओ के लिए मैं यही बोलना चाहूँगा की आप मे से काफ़ी लोग अभी किसी कारणवश कॉमिक्स से दूर होते जा रहे हैं, कोशिश  करिए की अपने आनेवाले पीढ़ी को आप प्रोत्साहित करे कॉमिक्स पढ़ने के लिए और खुद भी पढ़ें और खरीदें। 

- मोहित शर्मा ज़हन

Thursday, March 2, 2017

ICF Magazine Volume #11

इंडियन कॉमिक्स फैंडम #11 

Download/Online Read-  ReadwhereISSUUScribdCalameoPDFSRArchives, SSAuthor StreamFliiby, PublitasFreelease, Pothi, Google Books, Google Play, 4Shared and allied websites/apps.

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Special: Artist-Author Akshay Dhar Interview, Late Writer Ved Prakash Sharma (Tribute), Artist Gaman Palem, ICF Awards 2016 Champions Corner
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Editor: Mohit Trendster
Freelance Talents (March 2017)

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